गुरु-चेतना का विकास

Sleep always in the lap of the Beloved Satguru. Rest as the ray rests in the Sun. Remember God with love by reciting His Divine Name while going to sleep and as you get up hold fast again His Lotus Feet and recite His Divine Name. Remember God when you go to sleep and remember God when you get up.
देखो तो गुरु को! सुनो तो गुरु को! खाओ तो गुरु का सीतप्रसाद ! पियो तो गुरु का अमृत ! सोओ तो गुरु की गोद में, जिस प्रकार किरण सूरज में विश्राम करती है ! नहाओ तो गुरु के चरणामृत-सरोवर में! सेवा करो तो मानसिक सेवा श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की !

सर्वदा सतगुरु को देखना चाहिए। अपने सतगुरु पर तब तक अपनी दृष्टि केन्द्रित करें जब तक हम अपने अन्तर्मन में हर एक इन्सान में तथा हर एक स्थान पर परमात्मा के स्वरूप को देखना आरंभ न कर दें। सतगुरु पर हमेशा ध्यान केन्द्रित करने से आँखें भी दिव्य बन जाती हैं और फिर प्रत्येक स्थान और प्रत्येक प्राणी में सतगुरु को देखना शुरु कर देती हैं। बाहरी तथा आन्तरिक ज्ञान भी दिव्य हो जाता है। तब दिल और दिमाग़ पूरी तरह प्यारे गुरु की भक्ति और सेवा में पूरी तरह समर्पित हो जाता है।

परमात्मा की दिव्य महिमा और दिव्य नाम का गान और जाप करो। पवित्रा कीर्तन और दिव्य नाम जपने से ईश्वरीय रुझान में वृद्धि होती है।

पवित्रा गुरबाणी और कीर्तन का हम श्रवण करें। पवित्रा भजनों के दिव्य संगीत और लय को सुनें।

वही भोजन और जल ग्रहण करें जिसे पहले सतगुरु के लिए परोस कर पवित्रा कर लिया गया हो। इस को ‘विवेकी’ प्रसाद कहते हैं। सतगुरु को अर्पित किए गए भोजन को खाने से प्रेम, श्रद्धा और भक्ति में वृद्धि होती है। इस पवित्रा प्रसाद से बुद्धि पूरी तरह स्वच्छ और निर्मल हो जाती है। यह प्रसाद अर्न्तमन को पवित्रा कर देता है।

सदा सतगुरु की गोद का आनंद लेना चाहिए। उसी प्रकार जैसे किरण सूर्य में विश्राम करती है। सोते समय परमात्मा को प्रेमपूर्वक याद करें और सुबह नींद खुलते ही उसके चरण-कमलों का ध्यान करते हुए उसके दिव्य नाम का स्मरण करें। सोते और जागते समय हमेशा परमात्मा को याद करें। इस प्रकार पूरी नींद पवित्रा हो जाती है। जिस प्रकार बूंद सागर में और किरण सूर्य में विश्राम करती है। उसी तरह सतगुरु की गोद में विश्राम करें और सोयें। एक समर्पित बच्चे की तरह प्यारे सतगुरु की दिव्य गोद में सोयें।

मेरा मात पिता गुर सतगुर पूरा ।

सोते और जागते समय सतगुरु का ध्यान करना कभी न भूलें।

स्नान करते समय ध्यान मग्न होकर प्यारे गुरु के चरणामृत के पवित्रा अमृत-सरोवर में डुबकी लगाएं।

इस प्रकार सभी इन्द्रियों और शरीर को प्यारे सतगुरु के ध्यान और सेवा में लगायें।

हमें अपने शरीर को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पवित्रा सेवा और धार्मिक स्थानों की पवित्रा यात्रा में व्यस्त रखना चाहिए।

ऐसे सौभाग्यशाली गुरमुख, गुरु-चेतना में देखते, सुनते, बोलते, खाते-पीते, सोते और सेवा करते हुए रहते है। यह कितनी आनंददायक अवस्था होती है। वे गुरु चेतना में रहते हैं, क्योंकि उन्होंने रूहानियत में एक गहरी डुबकी लगा ली होती है। एक सच्चा सिख अपने जीवन का हर श्वास गुरु चेतना में लेता है।

इक नूँ ध्याओ इक नूँ देखो इक दे बन जाओ।

गुरु पर अपना-आप न्यौछावर करने की यही एक युक्ति है कि हम गुरु को अपना तन, मन और धन अर्पित करके उसकी आज्ञा में ही रहें।

‘घट बोलो, बोलन विच बड़े पाप हो जाँन्दें हन।’ कम बोलो, बोलने में बहुत पाप हो जाते हैं।

बेकार और फ़ालतू की बातों में जाने-अनजाने कई पाप हो जाते है। चुग़लख़ोरी, झूठ या बेकार की बेतुकी बातें कीमती श्वासों कों बर्बाद करती है। जितना संभव हो कम बोलें। फ़िजूल की बातों से ही निन्दा जन्म लेती है। जिससे दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती है।

आध्यात्मिक विकास के लिए विवेकशील मौन बहुत ही फलदायक है। एक शांत मन सरलता से परमात्म में ध्यानस्थ हो जाता है।