प्रेम का मापक-प्रतिमान

True prem, True love cuts across all the barriers and limitations of time and space. Satguru is the true bestower, true channel of Divine Love as well as true recipient of this true love from His true devotees and sikhs.

सन् 1699 की वैसाखी के पवित्रा उत्सव पर एकत्रा 80 हज़ार की संगत में दशमेश पिताजी ने यही मापक प्रतिमान लगाया था। पाँच प्यारे प्रेम की कसौटी पर खरे उतरे। सच्चे पातशाह फ़रमाते हैं-

साच कहौ सुनु लेहु सभै जिनि प्रेम किओ तिन ही प्रभु पाइओ।।
-श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी

सिख भी गुरु को तभी प्राप्त कर सकता है जब वह उसके प्यार में पूरा उतरे। वे पाँच जब इस कसौटी पर पूरे उतरे तो सदा-सर्वदा के लिए प्यारे बन गए।

सभ कुछ रब्ब दे वस विच है पर रब्ब प्रेम दे वस है।
दातार पिता सब चीज़ों को देते हुए कभी थकता नहीं। वह देने में औढर दानी है। भूखों की भूख मिटाता है और ज़रूरतमंदों की ज़रूरत पूरी करता है। पर वह स्वयं भी कुछ चाहता है, एक वस्तु पाने की उसे बहुत ही भूख रहती है। यह बहुत ही आश्चर्यजनक चीज़ है। दातार पिता प्रभु परमेश्वर निरंकार स्वरूप सतगुरु को भी यह भूख सताती है। उसके दरबार में तो इस दुर्लभ वस्तु का अकाल पड़ा हुआ है। उसे तो बस एक ही भूख है और वह है- सच्चे प्रेम की। उसे मात्रा प्रेम की ही लालसा है उसे केवल प्रेम की ही प्यास है। वह केवल सच्चे प्रेम के लिए ही तड़पता है। कोई विरला ही उसके प्रेम में बावला होता है। सारी दुनिया परमात्मा के पीछे कुछ न कुछ पाने के लिए भागती फिरती है, पर परमात्मा तो सिर्फ प्रेम के पीछे भागता है। यह सारा खेल ही प्रेम का है।

साध-संगत जी, हम जो कुछ भी करें, हार्दिक प्रेम से करें। सेवा करें तो प्रेम से करें। नाम जपें तो प्रेम से। कीर्तन करें तो प्रेम से। उसके चरणों में श्वास लें तो प्रेम से। हमारा मनोरथ सतगुरु को रिझाना और उसकी प्रसन्नता प्राप्त करना है। और वह प्रसन्न होता है- केवल प्रेम से।

यह सारा कौतुक इस थर्मामीटर का है। श्री गुरु नानक साहिब जी ने यही थर्मामीटर श्री गुरु अंगद साहिब पर लगाया था और श्री अंगद साहिब जी ने गुरु अमरदास जी पर लगाया। श्री गुरु अमरदास जी ने सच्चे पातशाह श्री गुरु रामदास जी पर यह थर्मामीटर लगाया। परमात्मा प्रेम है और प्रेम ही परमात्मा है। जब उस पूर्ण प्रेम को अपने पूरे निखार में श्री गुरु अंगद साहिब के स्वरूप में ज्योतिर्मान देखा तो श्री गुरु नानक पातशाह ने भाई लहणा जी के प्रेमवश होकर अपना मस्तक उनके चरणों में रख दिया। अपना सब कुछ उन पर न्यौछावर कर दिया। जब श्री गुरु अंगद साहिब जी ने प्रत्यक्ष प्रेम ही प्रेम के जाग्रत स्वरूप श्री गुरु अमरदास जी को देखा तो उनके चरणों पर अपना मस्तक रख कर उन्हें बारह वर देते हुए अपना सब कुछ उन पर न्यौछावर कर दिया।