परिचय

Firmly established in the Lord, fearless of death, totally dedicated and wedded to his profession, he was tireless and full-souled in action.

With this fire of immortality in his radiant eyes, he performed great heroic acts of valour at Rawalpindi. He came to be widely known there as the ‘Saviour of Rawalpindi’.

मेरे पिता बाबा नरिन्द्र सिंह जी कपूरथला रियासत में स्थित आहलुवालिया जाति के संभ्रांत परिवार में से थे। उनके पिता सरदार साहिब सरदार सुचेत सिंह जी कपूरथला रियासत की पुलिस के अधीक्षक (मुखिया) थे। उनके दादा सरदार साहिब सरदार ईश्वर सिंह जी अंग्रेजों के समय कपूरथला रियासत के प्रतिनिधि थे। उनके पिता जी व दादा जी पूर्व कपूरथला रियासतों में मान-सम्मान वाले उच्च पदों पर रहे थे। हमारे दादा जी अपने समय के प्रसिद्ध व वीर पुलिस अफसर थे। उनकी अपनी वीरता के कारण किंग्ज़ पुलिस मैडल (राजा की ओर से दिया जाने वाला पुलिस मैडल) सहित बहादुरी के अनेक इनाम मिले थे। मेरे पिता जी बड़े मान से कहा करते थे कि उनको अपनी इस नौकरी में हमारे दादा जी से अत्यधिक प्रेरणा मिलती थी।

देश के बँटवारे के समय मेरे पिता जी वीरता के सब से अधिक मैडल प्राप्त करने वाले पुलिस अफसरों में से थे। उन के अनगिनत खतरनाक मुकाबलों की कोई गणना नहीं की जा सकती। यह मुकाबले उन्होंने अत्यधिक बदनाम डाकुओं से किए थे। वीरता के अन्य इनामों के अतिरिक्त अत्यधिक वीरता दिखाने के लिए उनको दो बार किंग्ज़ पुलिस मैडल मिला था। यह पुलिस में वीरता का सब से बड़ा इनाम होता था। डाकुओं को मारने तथा उनके भय को समाप्त करने हेतु उनका नाम एक गाथा बन चुका था। कई अवसर तो ऐसे भी आए थे, जब डाकुओं को यह जानकारी हो जाने पर कि वह इस पुलिस अफसर के घेरे में पँफस गए हैं तो वे खूंखार व कुख्यात डाकू उन के समक्ष हथियार पेंफक कर आत्म-समर्पण कर देते थे।

एक बार मैं उन के साथ अर्धरात्रि के समय जीप में फिरोजपुर-लुधियाना सड़क पर सफ़र कर रहा था। सफ़र में थोड़ी दूर हमने जीप की रोशनी में गाँव के एक व्यक्ति को सड़क पर जाते हुए देखा। पिता जी ने जीप रोक कर उस व्यक्ति को पास बुलाया। मेरे पिता जी ने उस का परिचय पूछा तथा अन्य जाँच-पड़ताल की। उस व्यक्ति ने अपना व अपने गाँव का नाम बताया तथा कहा कि खेतों में पानी लगाने की आज उन की पारी है। इसलिए वह अपने खेतो में जा रहा है। यह सुन कर पिता जी चल पड़े। पर फिर रुक गए तथा पूछा कि तेरे गाँव के जैलदार का क्या नाम है? वह आदमी झिझक गया। उसने कम्बल अपने ऊपर ओढ़ा हुआ था, अचानक उसने अपना रिवाल्वर निकाल कर मेरे पिता जी को ओर तान दिया। पिता जी अपना संतुलन बनाए हुए फुर्ती से सिंह-गर्जना करते हुए उस पर टूट पड़े। उस के हाथों से रिवाल्वर गिर पड़ा। पिता जी अपना भरा हुआ रिवाल्वर दाईं ओर रखते थे। उन्होंने रिवाल्वर की नोक उस अनजान आदमी की ओर कर दी। पिता जी ने बाँध कर उस को जीप में पेंफक दिया। बाद में पता चला कि वह एक कुख्यात व खूंखार डाकू था, जिसे पुलिस ढूँढ रही थी। उस दिन जब पिता जी ने सिंह-गर्जना की थी तो हम सब भी भयभीत हो गए थे।

उनका व्यक्तित्व आकर्षक, प्रभावशाली व मोहित करने वाला था तथा इसका प्रभाव भव्य होता था। अधीनस्थ कर्मचारी, सहयोगी अफसर तथा अन्य जो भी उनके सम्पर्वफ में आते, उनका बहुत ही आदर-सत्कार किया करते थे। उनका जीवन वीरता के कार्यों तथा आत्मिक उच्चता की एक लम्बी दास्तान है।

एक बार सन् 1942 में वह अकेले ही बाबा नंद सिंह जी महाराज के सन्मुख खड़े थे। बाबा जी ने मेरे पिता जी की ओर गहरी नज़रों से देख कर कहा -

जामि गुरु होइ वलि
लख बाहे किआ किजइ॥

इस प्रकार बाबा जी ने हज़ारों चुनौती भरी स्थितियों में उन के सिर पर कृपा का हाथ रखा था। बाबा जी ने अंग-संग साथ रहने का वर प्रदान किया हुआ था।

सन् 1947 के बँटवारे से पूर्व वह रावलपिण्डी में नियुक्त थे। प्रभु में ध्यान-मग्न रहने, मृत्यु से निर्भय होने तथा अपने कत्र्तव्य के प्रति तन-मन से समर्पित होने के कारण वे अपने सभी कर्मों में अनथक व उच्च स्थिति में रहते थे। उनके नेत्रों में रूहानी चमक-दमक थी। उन्होंने रावलपिण्डी में आश्चर्यजनक वीरता के कई कार्य किए थे।

इस क्षेत्रा में उन को ‘रावलपिण्डी का रक्षक’ (The Saviour of Rawalpindi) कहा जाता था।

रावलपिण्डी रेंज के डी.आई.जी. पुलिस मिस्टर स्काॅट ने एक बार मुझ से कहा था कि उसने अपने जीवन की सारी नौकरी में मेरे पिता जी जैसा वीर पुलिस अफसर नहीं देखा था। इन कुछ घटनाओं का विवरण अगली पुस्तक में दिया जाएगा। बाबा नंद सिंह जी महाराज सभी कठिन परिस्थितियों में अपने इस आत्मिक पुत्रा के अंग-संग सहायक हुए थे।

पिता जी अपने दयालु स्वभाव, धार्मिक वृत्ति व परोपकारों से जाने जाते थे। कोई भी ज़रूरतमंद व्यक्ति उनसे निराश नहीं लौटा था। देश के बँटवारे के उपरान्त कई शरणार्थियों को तथा बाबा जी के कारण जान-पहचान वाले सत्संगियों को उनकी सहायता की आवश्यकता पड़ी थी तो उन्होंने बढ़-चढ़ कर उन की सहायता की थी। कई शरणार्थियों के पास तो ज़रा भी धन-राशि शेष नहीं बची थी, कइयों के पास गर्म कपड़े भी नहीं थे। मुझे याद है कि घर में हमारे लिए कोई कम्बल शेष नहीं बचा था क्योंकि हमने इन ज़रूरतमंदों को सब वस्तुएँ बाँट दी थीं। उस समय वे लुधियाना जिला के मुख्य पुलिस अधिकारी थे।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी अमृत वाणी का सागर हैं। अगर इस अमृत वाणी को प्रत्यक्ष श्री गुरु नानक देव जी के उपस्थित होने के भाव से श्रवण किया जाए तो उस के भाग्य जाग जाते हैं तथा उसको सभी प्रतिफल प्राप्त हो जाते हैं।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब में आस्था रखने से सभी दुःख दूर हो जाते हैं तथा अलौकिक आभा उत्पन्न होती है। श्री गुरु नानक साहिब जी की कृपालु दृष्टि से बहते अमृत रस से बड़े से बड़ा पापी भी श्रद्धालु संत देवता बन गया था। आज भी यह अमृत-रस श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भरपूर है तथा उसी प्रकार प्रवाहित हो रहा है। उनकी पवित्रा दृष्टि में प्रवाहित प्रेम की शक्तिशाली किरणें उनके सन्मुख होने वाले सभी जीवों व वस्तुओं पर पड़ती है तथा जीवों को मुक्ति प्रदान करती है तथा आत्माओं को मुक्त करती है।

मेरे पिता जी का हृदय, बलवती आस्था से पूर्ण व श्रद्धा से भरपूर था। हृदय में गुरु का निवास होने के कारण उनके जीवन में कई रूहानी घटनाएँ हुई थीं। उनका सारा जीवन सम्पूर्णता की आभा से मंडित था। उसमें अनुकरणीय शौर्य की आभा थी, दुर्लभ आभा का प्रकाश था, और दिव्य महानता की प्रभा थी।