बाबा नंद सिंह जी महाराज के 13 संकल्प - 2

भाउ भगति करि नीचु सदाए।।
तउ नानक मोखंतरु पाए।।
भक्त को स्वयं को श्रेष्ठ कहलवाने से आनन्द प्राप्त नहीं होता। उसे अपने आप को नीच कहलवाने में ही आनन्द मिलता है।
ब्रहम गिआनी सगल की रीना ।
आतम रसु ब्रहमगिआनी चीना ।

जो व्यक्ति वास्तव में सच्चा प्रेमी होता है, वह अपने प्रभु के द्वारा रचित संसार और अपने मालिक के कुत्ते के चरणों की भी धूल बन जाता है। इसलिए वह अपने आप को केवल छोटा (नीच) बताता ही नहीं बल्कि छोटा (नीच) कहलवाने में ही आनन्द प्राप्त करता है।

संसारी व्यक्ति के लिए निन्दा दुःखदायी है और संत के लिए वरदान है।

कमल के फूल की जड़ कीचड़ में होती है और कमल-नाल गंदे जल में, पर कमल का फूल उस कीचड़ और जल से निर्लेप होता है। इसी प्रकार यह दुनिया कीचड़ के समान है, दुनिया का व्यवहार-प्रसार उस मैले जल की तरह है और ब्रह्मज्ञानी इन दोनों से निर्लेप और अनासक्त है।

बाबा नंद सिंह जी महाराज के ये नियम इस बात को भी दर्शाते हैं कि इसमें उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं था। वे अपने नाम और प्रसिद्धि-कामना से परे थे। वे परमात्मा के साथ पूर्ण रूप से अभेद हो चुके थे। परमात्मा और बाबा नंद सिंह जी महाराज के पवित्रा शरीर मे एक आलौकिक लीला रचा रहे थे।

वे सभी प्रकार की आसक्तियों, स्वाथ्र की दुनियावी भावनाओं और विचारों से मुक्त थे। एक पूर्ण संत के चित्त में ऐसी भावनाओं और विचारों का कोई अस्तित्व ही नहीं होता।

चित न भइओ हमरो आवन कहि।
चुभी रही स्रुति प्रभ चरनन महि।।
-श्री गुरु गोबिन्द सिंह साहिब

बाल्यावस्था से ही उन का मन और आत्मा अपने प्रिय प्रभु गुरु नानक पातशाह के चरण-कमलों में लीन था। वे इस नाशवान और क्षण भंगुर संसार से विलग थे। ईश्वरीय परम आनन्द में लीन वे पूर्ण रूप से परमात्मा से अभेद्य हो चुके थे।

हरि मनि तनि वसिआ सोई।
जै जै कारु करे सभु कोई।।

ऐसा सौभाग्यशाली मन और आत्मा परमात्मा का प्रतिबिम्ब बन जाता है। ऐसा पवित्रा जीव परमात्मा का ही प्रकाश होता है। परमात्मा का दिव्य नाम उसके रोम-रोम में व्याप्त होता है। वह स्वयं परमात्मा के दिव्य स्वरूप का एक हिस्सा बन जाता है। उसकी आत्मशक्ति ब्रह्माण्ड अथवा परमात्मा की इच्छा का एक अंग बन जाती है।

ऐसे पवित्रा जीव द्वारा ही ईश्वरीय प्रकाश और इच्छा प्रसारित होती है उसके चरण जिस भी धरती पर पड़ते है वह धरती पवित्रा हो जाती है। ऐसे ही पवित्रा व्यक्ति के माध्यम से परमात्मा दर्शन देते हैं वह धरती पर परमात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप होता है और एक सतगुरु भी।

जब मन का स्थान गुरु ले लेता है, मन ज्योति स्वरूप हो जाता है और आत्मा स्वयं परमात्मरूप हो जाती है।
प्रभु-भोग (प्रसाद) दर्शन

जहाँ तक भोग (प्रसाद) की दार्शनिकता का सम्बन्ध है, यह अटल सत्य है कि जिन महान संतों और भक्तों की वाणी श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अंकित है, भोग-प्रसाद के विषय में उनके मत अपने-अपने अनुभवों पर आधारित हैं। इसकी पुष्टि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब और भाई गुरदास जी की ‘वारों’ में की गयी है। यह अटल सत्य कई और दिव्य आत्माओं के अनुभवों पर भी आधारित है।

जैसा कि पहले भी कहा गया है कि जो कुछ भी हम परमात्मा के लिए अर्पित करते हैं, उसे हम अपना नहीं कह सकते। संसार की हर चीज़ हमें प्रभु सतगुरु की ओर से मिली हुई है।

सतगुरु पदार्थ नहीं माँगते, वे भावना के भूखे हैं।
‘भोग भावना नूँ ही लगदा है
असी सारे उस दा दित्ता ही खाँदें हाँ।’
पवित्राता और मलिनता का सुमेल नहीं हो सकता।

एक पवित्रा हृदय ज्योतिस्वरूप है ईश्वरीय प्रेम में लीन एक पवित्रा मन कभी भी कामिनी-कंचन, शानौ-शौकत, नाम-यश तथा धन-संचय हेतु की जाने वाली सभी प्रार्थनाओं से आसक्त नहीं हो सकता। एक पवित्रा हृदय दिव्य प्रकाश व परमानन्द से पूर्ण होता है। एक सच्चा संत कभी भी इस दिव्य प्रकाश व परमानन्द को, किसी सांसारिक भोग में पड़कर मलिन नहीं करेगा क्योंकि जिस प्रकार प्रकाश और अंधकार एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही ईश्वरीय प्रेम और सांसारिक प्रेम एक साथ नहीं रह सकते और ना ही ज्ञान का अज्ञानता से कोई मेल हो सकता है। यही कारण है कि उन्होंने कभी भी सांसारिक विषयों पर बात नहीं की थी और न ही किसी को अपनी उपस्थिति में अथवा अपने स्थानों पर ऐसा करने की आज्ञा दी थी।

एक दिन बाबा नंद सिंह जी महाराज ने एक महापुरुष की अवस्था का वर्णन करते हुए फ़रमाया कि-

कुएँ में डूबी हुई बालटी के अंदर भी और बाहर भी पानी है। पानी के सिवा और कुछ भी नहीं है। पानी निरंकार स्वरूप है और बालटी महापुरुष। बिलखती, तड़पती और बिछोह पीड़ा भोगती आत्माओं द्वारा अपनी मुक्ति और मार्गदर्शन व बन्धन से छुटकारे हेतु की गयी प्रेमभरी पुकारें एवं हाथ जोड़ कर की गयी प्रार्थनापूर्ण याचनाएँ, निरंकार परमात्मा से महापुरुष को उसी प्रकार खींच कर मातृलोक में ले आती हैं जिस प्रकार कुएँ के जल में डूबी बालटी को रस्सी बाहर खींच ले आती है।

महापुरुष संसार में आकर भी संसार से निर्लिप्त रहते हैं। निर्लेपता को समझाते हुए बाबा नंद सिंह जी महाराज ने फरमाया कि मछली पानी में रहती है। जब कभी वह पानी से अपना मुँह बाहर निकालती है, तो उस का दम घुटना शुरु हो जाता है और वह तत्काल पानी में डुबकी लगा देती है। पानी ही उस का जीवन है, प्राणों का आधार है। पानी ही उस का शुद्ध प्रेम है। पानी ही उस का एक मात्रा सहारा है। इसी प्रकार महापुरुष हर समय निरंकार के चरणां में लीन रहता है। वह उसकी भक्ति में डूबा रहता है। भक्ति ही उसके प्राण हैं, उसके जीवन का आधार है। परमात्मा का नाम अमर रस है। महापुरुष अपने श्वास-श्वास से नाम की खुमारी में समाया रहता है। जब कभी वह किसी सांसारिक कार्य या आवश्यकतावश उस लीनता, नाम की खुमारी से बाहर आता है तो उस का दम भी उस मछली की तरह ही घुटने लगता है जो पानी से मुँह बाहर करते ही घुटन महसूस करती है। जैसे मछली एकदम पानी में लौट जाती है, उसी प्रकार महापुरुष भी नाम की खुमारी, निरंकार के चरणों में लौट आते हैं। बाबा नंद सिंह जी महाराज सिर्फ़ संसार का कल्याण करने के लिए आए थे और संसार का कायाकल्प करके अन्तर्धान हो गए। वे संसार से पूरी तरह अनासक्त रहे और संसारिकता को स्वयं को स्पर्श भी नहीं करने दिया।

धन्न धन्न बाबा नंद सिंह साहिब जी।

केवल बाबा जी की पवित्रा उपस्थिति में उस सर्वशक्तिमान परमात्मा के नाम का ऐसा अद्भुत व चमत्कारिक प्रभाव होता था कि कोई भी सांसारिक विचार प्रवेश नहीं कर सकता था।

अपने जीवन के अंतिम समय तक उन्होंने इन नियमों का पालन बहुत दृढता से किया।

संसार और स्वार्थ से निर्लेप बाबा नंद सिंह जी महाराज आज भी आध्यात्मिकता के शिखर पर सुशोभित है।

भाउ भगति करि नीच सदाए ।
तउ नानक मोखंतरु पाए ।।

भाउ भगति का अर्थ है- भावपूर्ण भक्ति। गुरुनानक पातशाह स्वयं भक्ति के रहस्य, भक्ति की युक्ति को प्रकट करते हैं। विनम्रता और निरभिमानता की यह कैसी अद्भुत शान है। भाव पूर्ण भक्ति अमूल्य वस्तु है। यह अति पवित्रा उपलब्धि है।

यह पवित्रातम कार्य है, यह दुर्लभ हीरा है और परमात्मा का अनुपम आशीर्वाद है। इसे प्रदर्शन और प्रचार की पहुँच से छिपा कर हृदय रूपी कोषागार की पवित्रा गहराइयों में रखना चाहिए। सच्ची प्रेमा भक्ति का अर्थ है- सतगुरु का विशेष प्यार और आनंद। इसका प्रदर्शन करके या सांसारिकता से दूषित कर उसे मलिन नहीं किया जा सकता। भक्ति का अभिप्राय लोगों को या संसार को प्रभावित करना नहीं है।

इस पवित्रा मर्यादा में नवधा भक्ति के सभी प्रकार जैसे कि नाम स्मरण, कीर्तन, सेवा आदि अति सुन्दर रीति से जुड़े हुए हैं। लेकिन उनमें से प्रेमा भक्ति सर्वोच्च है।

भुच्चों कलां के महान बाबा हरनाम सिंह जी महाराज की रचनात्मक शक्ति से यह पवित्रा मर्यादा बाबा नंद सिंह जी महाराज के सम्पूर्ण जीवन, असीम व अनुपम प्रेम और विश्वास के उदाहरण के रूप में इस धरती पर प्रकट हुई है। इस प्रकार यह मर्यादा परमात्मा की देन है और अनन्त काल तक प्रकाशमान रहेगी।

महान बाबा जी की कृपादृष्टि से यह मर्यादा, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की भक्ति और सेवा सर्वकाल व्यापक रहेगी। इसे सम्पूर्ण मानवता का आदर और सत्कार मिलेगा। यह समूचे संसार को प्रेम के बंधन में बाँध के रखेगी तथा श्रद्धालुओं को अमरता के सुन्दरलोक की ओर मार्गदर्शित करती रहेगी।

प्यार में लीन सच्चे प्रेमी सांसारिक सुखों की ओर ध्यान नहीं देते। हमारे परम सतगुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अपनी जवानी के 26 से भी अधिक साल बाबा बकाला की एक गुफ़ा में अकेले तपस्या तथा भक्ति करते हुए व्यतीत किए। हमारे निरंकार गुरु नानक पातशाह जी ने संसार के विशाल वीरान क्षेत्रों तथा खूँखार जानवरों व आदमखोर राक्षसों से अटे पड़े भयानक जंगलों में अपनी लम्बी प्रसिद्ध उदासियाँ (यात्राएँ) सम्पन्न कीं।

श्री गुरु अमरदास जी ने अपनी वृद्धावस्था का लम्बा समय अपने अत्यन्त प्रिय गुरु अंगद देव जी के पवित्रा स्नान के लिए पानी को, उलटे पाँव चल कर, लाने में व्यतीत किए। पूरी तरह परमात्मा के पवित्रा चरणों में लीन श्री गुरु गोबिन्द सिंह साहिब जी ने हेम कुण्ड साहिब में अद्वितीय साधना, गहरी भक्ति और घोर तपस्या की।

बाबा नंद सिंह जी महाराज ने अपना पूरा जीवन ही वीरान इलाकों, बीहड़ जंगलों, पहाड़ों और एकान्त स्थानों में कठिन तपस्या करते व प्रभु भक्ति में व्यतीत किया।

बाबा नंद सिंह जी महाराज के जीवन और व्यक्तित्व में सभी ईश्वरीय विशेषताओं का समावेश है।

भक्ति काँटों का रास्ता है। दरगाही फूल इन लम्बे रास्तों की मंज़िल पर पहुँचने का सुफल हैं।

इसका अभिप्राय समझाते हुए उन्होंने फ़रमाया कि भक्त धु्रव एक राजकुमार था, भक्ति रूपी काँटों के रास्ते और जंगलों के कष्टों से गुज़र कर ही भक्त धु्रव को दरगाही फूलों का प्रसाद मिला।

भक्त प्रह्लाद भी राजकुमार थे, तख्तो-ताज के वारिस थे। महलों में रहते हुए भी भक्ति रूपी कंटीलें रास्तो के कष्ट और अवरोध उस बालक को सहने पडे़।

राम जपउ जीअ ऐसे ऐसे।
ध्रू प्रहिलाद जपिओ हरि जैसे।।

आज तक किसी भी प्रेमी को फूलों की सेज पर परमात्मा की प्राप्ति नहीं हुई।

इस कलियुग विच एह नेमा दा काल पै गया है।
यदि जीवन में किसी ऐसे संत से मेल हो जाए जो बाबा नंद सिंह जी महाराज के तेरह नियमों में से किसी एक भी नियम का पालन करता हो तो उसके चरणों पर श्रद्धापूर्णक नमन करें। वह आपको भवसागर से पार उतार देगा।

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की विशुद्ध पूजा तथा प्रेम और सेवा को पूर्णतया समर्पित उनका (बाबा नंद सिंह जी महाराज की) पूरा जीवन सारे संसार का मुख श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के चरणों की ओर करने और जोड़ने में लग गया, ना कि अपनी ओर। उन्होंने ‘धन्न गुरु नानक तू ही निरंकार’ महावाक्य को सारे संसार के जीवन का लक्ष्य बना दिया पर स्वयं को उस लक्ष्य का केन्द्र नहीं बनने दिया। सारी दुनिया से केवल गुरु नानक देव जी की ही स्तुति करवाई परन्तु स्वयं की स्तुति का नामो-निशां ही नहीं बनने दिया। (न कोई स्वयं का स्थान बनाया, न कोई अपना स्मारक बनाया अपितु दिवंगत शरीर का जल-प्रवाह करवा के अपना कोई निशान ही नहीं रहने दिया)। उनकी भक्ति का लक्ष्य लोगों को अपने प्रति उन्मुख करना नहीं था, अपितु श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की अमर शान तथा अनुपम पवित्राता का प्रसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में करना था।

उनकी सम्पूर्ण मर्यादा एक श्रद्धालु के पूरे जीवन में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के प्रति भक्ति भाव बनाए रखती है तथा श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के दिव्य प्रकाश और अमर उपस्थिति से सम्पूर्ण संसार को आकर्षित करती है। यह सभी वर्गं के लोगों को संतोष प्रदान करती है और उन्हें लुभाती है। छोटे-बडे़, अमीर गरीब तथा शिक्षित-अशिक्षित को आध्यात्मिक रूप से अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें आनन्द प्रदान करती है।

उन्होंने कभी भी अपने प्रचार अथवा प्रसिद्धि का प्रसार नहीं किया क्योंकि नाम प्रसिद्धि व अपना गुणगान उनके लिए निरर्थक था। इन सब का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। यह हैरानी की बात है कि प्रचार और प्रसिद्धि के अभाव में भी उन्होंने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की अमर शान को सारे ब्रह्माण्ड में फैलाया। यह अपने आप में एक अलौकिक चमत्कार है। उन्होंने नयी पवित्रा संस्कृति, मर्यादा और नयी पावन परम्परा का सूत्रापात किया। एक ऐसी मर्यादा जो वरदान या पुरस्कार प्राप्ति जैसी इच्छाओं से निर्लेप है जिसमें अपने आप के लिए कोई स्थान नहीं है। एक ऐसी मर्यादा जो कामिनी, कंचन, मान-सम्मान, प्रचार-प्रसार जैसे सांसारिक बंधनों से परे है।

उनकी यह पवित्रा मर्यादा एक ऐसे पार-उतारू और रक्षक जहाज़ की तरह है जो कि शाश्वत दिव्य ज्ञान, सर्वव्याप्त आध्यात्मिक सम्पदा, समानता और सद्भाव से लबरेज है।

यह मर्यादा सभी सच्चे श्रद्धालुओं के लिए एक उच्चतम आदर्श है। इस मर्यादा में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के प्रति सच्चे वैराग्य, पूर्ण समर्पण, विशेष प्यार, स्तुति और पूजा का तत्व प्रधान है।

स्वयं परमात्मा अपनी सम्पूर्ण रचना सहित इस मर्यादा के आगोश में है। आने वाले समय में श्री गुरु नानक साहिब जी के सौभाग्यशाली बच्चे इस अद्वितीय मर्यादा के विशेष फलों का आस्वादन करेंगे और आनंद उठा पायेंगें।

इस मर्यादा का एक मात्रा उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है। इस मर्यादा में किसी सांसारिक वस्तु के लिए कोई स्थान नहीं है। चूंकि यह मर्यादा कामना व इच्छा रहित है, इसलिए इस मर्यादा में किसी अन्य पदार्थ व वस्तु के प्रति कोई तृष्णा नहीं है। यह मर्यादा अपने आप में पूर्णतया ईश्वरीय है इसलिए इस मर्यादा को समर्पित प्रत्येक पल दिव्य हो जाता है।

ऐसी स्वर्णिम धारणाओं पर आधारित मर्यादा को मानने और उसका पालन करने वाले संसार के मालिक बन जाते हैं न कि उसके गुलाम।

परगट गुरां की देह श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण और बलिदान ही इस मर्यादा का उद्देश्य है। इस पवित्रा मर्यादा में दिखावा, प्रदर्शन, प्रचार और प्रसिद्धि की कोई जगह नहीं है।

अपने बालपन से ही उन्होंने संसार की सभी कामनाओं पर काबू पा लिया था। एक संत कभी भी सांसारिक वस्तुओं में लिप्त नहीं होता और न ही कभी इन्द्रियों का गुलाम होता है।

इस मर्यादा में वरदानों, कामनाओं और आवश्यकताओं की पूर्ण निवृत्ति होती है।

जिस व्यक्ति के हृदय में उस दातार परम पिता के लिए तड़प है, जिसने उसके प्रेम का रस चख लिया है उसे किसी अन्य वस्तु की लालसा नहीं रहती। ऐसी दिव्य आत्मा के लिए, परमात्मा से ध्यान हटा कर स्कूल-कालेज, अस्पताल या लंगर चलाना, डेरे व भवन निर्माण कराना, स्व प्रचार-प्रसार या प्रदर्शन करना पूर्णतया अर्थहीन/महत्त्वहीन है।

एक दिव्य आत्मा और पैदाइशी पैगम्बर होने के नाते से बाबा नंद सिंह जी महाराज ने अपने लिए कुछ भी नहीं करना था। अपने निजी लाभ के लिए उन्होंने कभी कुछ नहीं किया। उन्होंने ऐसी मर्यादा तैयार की, जिसमें इच्छाहीनता, स्वार्थहीनता और पूर्ण त्याग था। कलियुग के ऐसे भयानक समय में बाबा नंद सिंह जी महाराज ही इस मर्यादा को ऐसी शान और निपुणता के साथ कायम करने के योग्य थे। बाबा नंद सिंह जी महाराज के द्वारा शुरु की गयी सुनहरी मर्यादा सम्पूर्ण विश्व के रक्षक के रूप में सदा प्रकाशित रहेगी।

बाबा नंद सिंह जी महाराज के लिए जगत् गुरु नानक पातशाह से प्रेम की तुलना में मोक्ष और तीनों लोकों की प्राप्ति कोई मायने नहीं रखती थी। इसलिए वह पूर्णतया संयमित और संसार से अनासक्त थे।

पाँच वर्ष की छोटी-सी उम्र से ही वे गुरुनानक साहिब जी के दिव्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था में लीन थे। उनका निश्चय दृढ़ था। ऐसा दृढ़ निश्चय धरती पर पहले कभी देखा ही नहीं गया था।

“यदि गुरु नानक के प्यार में खून भी पानी हो जाए, हड्डियाँ भी सूख जाएँ और मौत भी आलिंगन में ले ले (जान भी निकल जाए), प्रेम करने वाला पूरी तरह से नष्ट हो जाए, तो भी क्या हुआ?”

छोटी सी उम्र में ही इस बाल रूपी भगवान का ऐसा दृढ़ निश्चय था।

उन्होंने छोटी-सी उम्र में ही सब कुछ श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पवित्रा चरणों में त्याग दिया था। एक महान ऐतिहासिक युग की शुरुआत होनी अभी बाकी थी।

संसार में सभी सजीव और निर्जीव परमात्मा के आश्रय में स्थित हैं। संसार तो केवल परमात्मा की परछाई है, प्रतिबिम्ब है। उनके महान नियम संसार की इस परछाईं या प्रतिबिम्ब के सम्बन्धों से नहीं जुड़े हैं अपितु उन महान नियमों का एक मात्रा सम्बन्ध तो वास्तविक मूल तत्व परमात्मा से था।

ये नियम बाबा नंद सिंह जी महाराज की पूर्ण दिव्यता, अनासक्त और निर्लेप प्रकृति को दर्शाते हैं।