वन्य प्राणियों पर अनन्त कृपा

पवित्राता तथा प्रेम के सागर बाबा नंद सिंह जी महाराज की ही यह अपार लीला थी। उनकी हजूरी में हृदय शुद्ध हो जाता था। हृदय से पवित्रा व सच्चे प्रेम की ज्योति जगने से उच्च आत्मिक अवस्था का द्वार खुल जाता था। उनके दिव्य-प्रेम व प्रभाव में प्रकृति भी नतमस्तक खड़ी हो जाती तथा बाबा जी के आदर में बहुत विनम्रता दिखाती थी। सम्पूर्ण संगत को प्रेम-सागर बाबा जी के दिव्य आशीर्वाद के कवच की अनुभूति होती थी। दयालु बाबा जी जब अरदास करते थे तो वहाँ उपस्थित सम्पूर्ण संगत के मंगल की प्रार्थना करके मुक्ति के दाता मुक्ति लुटा देते थे।

“हे गुरु नानक इह हरिया भरिया बेड़ा, जीअ-जंत, पशु-पक्षी, कीट पतंगा इस्से तरहाँ पार कर दें।”

बाबा जी अरदास में सभी मनुष्यों, जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों तथा कीट-पतंगों आदि जीवों की मुक्ति के लिए प्रार्थना किया करते थे। मुक्ति-दाता बाबा नंद सिंह जी महाराज की कृपा-दृष्टि से बाहर कुछ नहीं रहता था। उनकी अरदास सभी जीवों के उद्धार के लिए होती थी। यह उनकी सम्पूर्ण सृष्टि पर अपार कृपा थी, एक महान् उपकार था।

दास को अनेक बार पूर्णिमा के दिन बाबा नंद सिंह जी महाराज द्वारा की गई ‘अरदास’ में सम्मिलित होने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु उनकी अरदास के समय उपस्थित होने को धन्य समझते थे तथा इसके लिए तरसते थे। उनकी अरदास अत्यधिक श्रद्धा-भावना वाली होती थी। अरदास में वह श्री गुरु नानक साहिब के साथ प्रत्यक्ष रूप में बातचीत किया करते थे। श्री गुरु नानक साहिब जी के समक्ष की जाने वाली निजी अरदास के प्रभाव से उपस्थित संगत को गुरु जी के पवित्रा चरणों के साथ जुड़े होने की प्रतीति होती थी। बाबा जी की इस अरदास के जादुई प्रभाव से सारी संगत का अपने पूर्व कर्मों के पापों के नाश होने तथा मुक्त हो जाने का निश्चय हो जाता था।

अरदास की दिव्य-अनुभूति से उनका ध्यान उच्च रूहानी मण्डल में पहुँच जाता था। इस प्रकार सारी संगत श्री गुरु नानक साहिब जी की अनन्त कृपा के मण्डल में पहुँच जाती थी।

बाबा जी के पवित्रा चरणों पर
घायल हिरण का आना

बाबा जी की दया-दृष्टि सभी जानवरों, पक्षियों, कीड़ों, मकौड़ों आदि पर पड़ती थी। ये लघु प्राणी जीवन-प्रदाता बाबा जी की ओर आकर्षित हुए चले आते थे तथा उनके पवित्रा चरणों में गिर कर मुक्ति प्राप्त करना चाहते थे। बाबा जी की उपस्थिति में सब जानवर किसी दैवी शक्ति के प्रभाव का अहसास करवाते थे। उनके व्यवहार व मानसिक अवस्था से ऐसा प्रतीत होता था, मानो वे सब मुक्ति, उद्धार तथा उस जीवन से स्वतन्त्राता के लिए बाबा जी से ज़ोरदार प्रार्थना कर रहे हों।

एक बार की बात है कि एक हिरण को कुछ शिकारियों ने घायल कर दिया था और वे घोड़े से उसका पीछा कर रहे थे। यह घटना उनकी कुटिया (ठाठ) से मीलों दूर की है। बाबा जी उस समय अपनी भक्ति वाले कमरे में भक्ति कर रहे थे। अन्तर्यामी बाबा जी उस कमरे से शीघ्रता से बाहर निकले, ज्यों ही बाबा जी बाहर पहुँचे, वह घायल हिरण आकर बाबा जी के पवित्रा चरण-कमलों पर लेट गया तथा उसी समय उसने प्राण त्याग दिए। बाबा जी ने अपनी छड़ी उसके सिर पर छू दी। इसी समय हिरण का पीछा करने वाले भी वहाँ पहुँच गए। शिकारियों ने हिरण को बाबा जी के चरणों में अंतिम समय में मुक्ति प्राप्त करते देखा। वे इस चमत्कार को देखकर बाबा जी के चरणों में गिर पड़े। शिकारियों ने अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी तथा भविष्य में किसी की वन्य प्राणी को न मारने की प्रतिज्ञा करके वापस चले गए। बाबा जी ने उन्हें भी अपनी कृपा का पात्रा बना लिया था।

भेड़ों को भेड़ियों से बचाना

एक बार कुछ मुस्लिम चरवाहे अपनी भेड़ों के झुण्ड सहित जगराओं की ओर आ रहे थे, रास्ते में रेलवे पटरी आती थी। उस समय एक रेलवे अफसर की ट्राली पटरी के ऊपर से जा रही थी। भेड़ों के रेलवे पटरी पर खड़े होने के कारण ट्राली को रुकना पड़ा। उस अफसर ने क्रोधित होकर अपने साथ वाले व्यक्तियों को आदेश दिया कि भेड़ों के झुण्ड को जलाओ, खाना ले जाओ। इतने समय में बाबा जी भी संध्या-काल का भ्रमण करते हुए वहाँ पहुँच गए। रेलवे अफसर ने तथा उसके साथ वाले आदमियों ने आदर सहित बाबा जी को प्रणाम किया तो बाबा जी ने बड़े नम्र भाव से कहा:

“कुछ समय पहले ये भेडें़ भेड़ियों के पँजों से बचाई गई हैं, अब तुम लोग इस सारे झुण्ड को जलाओ- खाना कह रहे हो ?”

बाबा जी के ये शब्द सुनकर मुस्लिम चरवाहे उन के चरणों पर गिर पड़े। उन्होंने रेलवे अफसर को बताया कि किस प्रकार उनकी भेड़ों को भेड़ियों के घायल कर दिया था तथा किस प्रकार प्रभु ने उनको बचाया था। उन्होंने भेड़ियों के हमले से घायल हुई भेड़ों को भी उस अफसर को दिखाया। बाबा जी ने मुस्लिम चरवाहे को सब के पालनकत्र्ता ‘अल्लाह’ को याद करने के लिए कहा। इस प्रकार बाबा जी की कृपा-दृष्टि सभी मनुष्यों व वन्य प्राणियों पर बराबर पड़ती है। इस के पश्चात् ये चरवाहे प्रत्येक पूर्णिमा को बाबा जी के ठाठ पर नमस्कार करने आया करते थे।

बाबा जी में रूहानियत की रहस्यमयी शक्तियाँ होेने के कारण अगर कोई भी एक बार उन के दर्शन कर लेता था या उनकी संगत प्राप्त कर लेता था, वह सदैव के लिए बाबा जी का श्रद्धालु बन जाता था। उस के हृदय के भीतर बाबा जी के दर्शन बार-बार करने का आकर्षण बना रहता था। बाबा जी की सत्संगत में प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को सुरक्षित, निर्भय व सांसारिक भारों से हल्का अनुभव करता था। उनके पवित्रा निवास के बिना अन्य कोई स्थान सुरक्षित नहीं लगता था। उनकी पवित्रा उपस्थिति से पाप नष्ट हो जाते थे तथा महान् रक्षक के सहायक हाथों में शरण पाकर भय समाप्त हो जाता था। रूहानी शक्ति व आनंद के सागर बाबा जी की हजूरी में आत्मा को शान्ति की अनुभूति होती थी। सभी धर्मों के लोग तथा वन्य प्राणी बाबा जी के समीप आ जाते थे जैसे किसी अलौकिक शक्ति ने उनको बाबा जी के पास जाने का आदेश दिया हो। वह बाबा जी को अपना रक्षक व मुक्तिदाता समझकर आराधना करते थे।

कई बार वन्य पशु भी उनके दीवान में आकर बैठ जाते थे। ये वन्य प्राणी संगत के पीछे आकर बैठ जाते तथा कथा-कीर्तन सुनकर उस कर चले जाते थे। बाबा जी वन्य जन्तुओं पर अत्याचार का निषेध करते थे। कई बार फनीयर नाग जैसे जीव भी बाबा जी के सामने आते, अपना फन पैफलाते, सिर झुकाते तथा फिर मुक्ति प्राप्त कर के जाते। दयालु बाबा जी किसी भी मृत जीव-जन्तु को दबाने से पहले स्नान करवाने व जपुजी साहिब का पाठ करवाने का आदेश देते थे। संगत में से कइयों ने हैरान होकर इस का कारण जानना चाहा। बाबा जी अपने रूहानी आनंद में उसके पूर्व कर्मों व पूर्व जन्म लेने का कारण बताया करते थे। कई बार कई व्यक्ति उन नामों व उन की मृत्यु के कारणों का उन स्थानों पर जाकर पता भी करते थे, यह जानकर बड़े चकित होते थे कि जो भी बाबा जी बताते, वह शत-प्रतिशत सत्य होता था।