पवित्राता के सागर

He was an Ocean of purity and by the power of His crystal, divine purity, all the sinning humanity, the place, the whole environment, the whole atmosphere became pure.

बाबा जी का जीवन पूर्ण त्याग व वैराग्य का जीवन था। जितनी उन की रूहानी महानता है, उतना ही उन में रूहानी त्याग भी है। पूर्ण त्याग का भाव है पूर्ण रूहानी महानता। पूर्ण निर्लिप्तता का अर्थ है, प्रभु में पूर्ण लीनता।

जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु॥
श्री गुरु तेग बहादुर साहिब कहते हैं, जिसने माया व और अन्य कामनाओं का त्याग कर दिया है, वह पूर्ण रूप में निर्लिप्त है। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं- उस के हृदय में प्रभु का निवास को गया है। मेरे विचार में इस पृथ्वी पर उनके जीवन जैसा पूर्ण त्याग का अन्य उदाहरण मिलना असंभव है। एक बार बाबा हरनाम सिंह जी महाराज ने बाबा नंद सिंह जी महाराज को तीन बार दृढ़ता से कहा था कि कोई वर माँग लो, परन्तु बाबा जी ने पूर्ण निरभिलाषी रहने का वर माँगा था। वह तो त्याग को भी त्यागने वाले थे। उनकी अनोखी जीवन-कथा पूर्ण दयालुता, पवित्राता व निष्काम अवस्था का नमूना थी। अपवित्राता उन के समीप नहीं आई थी। एक बार उन्होंने कहा था-
उस्तत् गुरु नानक दी
निंदा सिर्फ अपनी।
स्तुति सिर्फ प्यारे गुरु नानक की करनी है, तथा निंदा केवल अपनी करनी है, तीसरा कोई अन्य नहीं आना चाहिए।
स्तुति सिर्फ प्यारे गुरु नानक की करनी है, तथा निंदा केवल अपनी करनी है, तीसरा कोई अन्य नहीं आना चाहिए।

बाबा जी ने अपने जीवन में न कभी किसी को शाप दिया और न ही कभी किसी की निंदा की थी। न आप ने कभी किसी के विषय में अपशब्द कहा था तथा न ही कभी सुना था।

वे पवित्राता के सागर थे। उन की त्रिकालदर्शी रूहानी पवित्राता से सम्पूर्ण मानवता, उनके आवास का स्थान, आस-पास का सारा वातावरण पवित्रा हो जाता था। उन के सम्पूर्ण जीवन में अहं लेश मात्रा भी न था। वह जन्म से ही विनम्रता तथा दीनता का साकार रूप थे। उनके प्रिय श्री गुरु नानक साहिब जी ने उनको जन्म से ही ‘सचखण्ड’ की दुर्लभ वस्तुओं का आशीर्वाद दिया हुआ था। वे वस्तुएँ थीं- नौ निधियाँ, नाम और गरीबी।